डॉ अशोक बंसल
कलम के सिपाही और क्रांतिकारियों के जरूरतमंद परिजनों के मददगार रहे दादा बनारसी दास चतुर्वेदी को फिरोजाबाद के सभी बाशिंदे, वे भी जिनका साहित्य और पत्रकारिता से दूर-दूर का नाता न था, बड़े सम्मान से देखते थे। मैं दादाजी के शहर में ही पैदा हुआ, पढ़ा लिखा। छात्र जीवन में उनकी शागिर्दी की, उनके चरणों में बैठ स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों के बारे में जाना, अंग्रेजी के लोकप्रिय लेखक ए.जी. गार्डिनर के लेख ही नहीं पढ़े, बल्कि दादा के निवास पर मैंने काकोरी केस के शहीद राम प्रसाद विस्मिल की बहिन शास्त्री देवी, मन्मथनाथ गुप्त, जैनेंद्र कुमार, हरिवंश राय बच्चन और न जाने कितनी महान हस्तियों को बहुत ही करीब से देखा-सुना। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने दादा को दो बार राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया था। तब मैं कई बार अपने पिता के साथ दिल्ली जाकर उनके सानिध्य का लाभ उठता रहा ।
दरअसल, पत्रकारिता के पितामह रहे दादा बनारसी दास का स्मरण मुझे उनके साथ की निकटता और आत्मीयता के कारण नहीं आ रहा, वरन मौजूदा दौर में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माने जाने वाली पत्रकारिता की चूलें हिल जाने और अधिकांश पत्रकारों के नैतिक पतन हो जाने के कारण हो रहा है।
दादा ने 1912 में लिखना शुरू किया और उनके जीवन में 15 जून 1914 का दिन सबसे महत्वपूर्ण था। उस दिन दादा की फिरोजाबाद के ‘भारती भवन’ पुस्तकालय में पं. तोताराम सनाढ्य नाम के एक साधारण व्यक्ति से मुलाकात हुई, जो फिरोजाबाद के पास के गांव हिरनगउ के निवासी और फिजी में 21 वर्ष रहकर किसी तरह अंग्रेजी हुकूमत के चंगुल से छूट कर भारत लौटे थे। हम सभी ने पढ़ा है कि 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेजी सरकार ने भारत के मेहनतकश विपन्न लोगों को फिजी में जाकर नौकरी करने का लालच दिया और फिर उन्हें कलकत्ते (अब कोलकाता) से पानी के जहाज में बैठाकर फिजी पहुंचाया। फिजी में इन मजदूरों से अंग्रेजों ने अपने गन्ने के खेतों में काम कराया, उनके पैरों में बेडिय़ां डालकर। इन्हीं मजदूरों में तोताराम भी थे। वे किसी तरह अंग्रेजों को धता बता कर अपने वतन लौटने में कामयाब हो गए। यह एक संयोग ही था कि फिरोजाबाद के पुस्तकालय में उनकी मुलाकात दादा से हो गई। दादा ने तोताराम के जीवन की मार्मिक कथा सुनी और फिर ‘फिजी में मेरे इक्कीस वर्ष’ पुस्तक लिख डाली। पुस्तक में तोताराम की 21 साल के कठोर जीवन की आपबीती है, जो गोरों के उस वक्त की काली हैवानियत को बेनकाब करती है।
इस पुस्तक ने देशभर में भूचाल ला दिया। लेखक का नाम गांधीजी तक जा पहुंचा। गांधीजी ने सी.एफ. एंड्रूज को दादा के पास फिरोजाबाद भेजा। ब्रिटिश पार्लियामेंट में इस पुस्तक की चर्चा हुई, सरकार की खूब फजीयत हुई और फिर भारत से मजदूरों के निर्यात पर रोक लगी। यह देशभर के अवाम के लिए जबरदस्त उपलब्धि थी, जिसके बल पर दादा अचानक साहित्य और पत्रकारिता के ‘ध्रुवतारा’ बन गए ।
मैंने दादा को करीब से देखा था, सो मेरे पास दादा के जीवन के अनेक रोचक किस्से सुरक्षित हैं। सन् 1972-73 की बात है। दादा को सुबह-शाम टहलने का शौक था, जिसके लिए वे फिरोजाबाद के पी.डी. जैन इंटर कॉलेज के मैदान में जाते थे। गर्मियों के दिन थे। कॉलेज में बोर्ड की परीक्षाएं चल रही थीं। एक दिन हिंदी का प्रश्नपत्र था। उसमें एक प्रश्न आया - ‘निम्नलिखित साहित्यकारों में से किसी एक की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिये।’ इनमें दादा बनारसी दास चतुर्वेदी का नाम भी था ।
दादा की सज्जनता और उनकी ऊंचे कद से फिरोजाबाद के छोटे-बड़े सभी परिचित थे, लेकिन उनके साहित्यिक कर्म को केवल साहित्यप्रेमी ही जानते थे। एक छात्र अपनी सीट से फील्ड में टहलते दादा को देख रहा था। उसने दादा को अनेक बार देखा था, लेकिन उनकी भाषा-शैली से उसका कोई परिचय न था। उसने फटाफट उक्त प्रश्न का उत्तर, यानि बनारसी दास चतुर्वेदी की भाषा-शैली लिखना शुरू की - ‘पं. बनारसी दास चतुर्वेदी मेरे सामने फील्ड में घूम रहे हैं, एक कंधे पर झोला है तो दूसरे पर लाठी है। हाथ में खुली कलम और कागज है।’ इस कॉलेज के प्राचार्य नरेंद्र कुमार जैन दादा के परम भक्त थे। परीक्षा भवन में मुआयना करते नरेंद्र कुमार की नजर छात्र की उत्तर पुस्तिका पर जा टिकी और कॉपी में लिखा पढ़ गए। प्राचार्य से रहा न गया। उन्होंने छात्र की उत्तर पुस्तिका उठाई और दौड़ पड़े दादा के पास, मजाकिया लहजे में बोले - ‘देखिये दादाजी, आपके साहित्य के बारे में छात्रों की कितनी जानकारी है।’ दादा ने कॉपी में लिखी लाइनें पढ़ीं, तो जोरदार ठहाका लगाया।
दादा जाड़ों में घुटनों के नीचे तक का लंबा कुर्ता पहनते थे। एक दिन टहल कर वापस आ रहे थे। तभी उनकी नजर मूंगफली के एक ठेले पर जा पड़ी। बोले - ‘क्या भाव है?’ मूंगफली वाले ने दादा को भरपूर नजरों से निहारा और बोला- ‘खानी है या बेचनी है?’ यह सुन दादा ने जोर का ठहाका लगाया। ठेलेवाले को क्या मालूम सामने खड़ा ग्राहक हिंदी पत्रकारिता का महान सपूत है।
दादा सादगी, विन्रमता और उन सभी मूल्यों को अपने जीवन में उतारते थे, जो गांधीजी में थे। जब शीत का ज्यादा प्रकोप होता था, तब दादा अपने लम्बे कुर्ते को 15 दिन सीधा और 15 दिन उल्टा पहनते थे। यह बात फिरोजाबाद में उनके बहुत करीबी लोग बताते थे।
मुझ जैसे साधारण व्यक्ति के लिए दादा जैसे महान व्यक्ति की दिनचर्या भी आकर्षण की चीज थी। उन्होंने अपने शहर में अपने आसपास ऐसा सुगन्धित वातावरण पैदा किया था, इंसानी रिश्तों की ऐसी फुलवारी रोपी थी, जिसकी खुश्बू को लोग जब भी मौका मिले, बिखेरने से नहीं चूकते हैं। जब दादा कलकत्ता में ‘विशाल भारत’ के सम्पादक थे, तब उन्होंने अनेक नौजवानों को लेखन की प्रेरणा देकर उन्हें साहित्यकार बनाया। बस चूक हुई तो एक, और वह भी उनके परिजनों द्वारा। दादा के स्वर्गवास के बाद फिरोजाबाद के उस ऐतिहासिक, साहित्यिक मंदिर, यानि उनके निवास स्थल को एक चूड़ी व्यापारी को बेच दिया गया। मेरी नजर में यह निवास तो एक संग्रहालय था। इस भवन में एक कमरा गोर्की के और एक टॉलस्टॉय के नाम पर था। दोनों कमरों में देश के तमाम साहित्यकार, क्रान्तिकारी, विदेशी लेखक आकर बैठे थे। दादा ने सम्पूर्ण जीवन इन्हीं कमरों में बैठकर चिंतन-मनन और लेखन किया था। विकसित देश में ऐसी कीमती धरोहर कदापि न बेची जाती। इस मकान को वहां की सरकार खरीदती और म्यूजियम के रूप में विकसित करती। ऐसे कई उदाहरण मेरे पास आस्ट्रेलिया के हैं। लंदन में भी एक गली में अंग्रेजी कथाकार आर्थर कैनन डायल (1930-1959) रहते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके मकान को एक स्मारक और संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया। आज यदि लन्दन में आप उस गली से गुजरें, तो मकान के बाहर ‘आर्थर कैनन डायल’ के नाम की तख्ती देख सोचने लगेंगे कि चांद पर जाने के सपने हम भले ही देख लें, अपनी सभ्यता, संस्कृति और साहित्य की रक्षा के मामले में हम बहुत पीछे हैं।